Poetry

पिंजरे

जब घर की औरतों के सर उठते हैं
तो न जाने क्यों लोग घबराने लगते हैं

कौन सी बात निकल कर आ जाये बाहर
इस डर से थरथराने लगते हैं

जिस पेड़ की छांव में बैठे हर दोपहर
उसी पर छिड़कते हैं सुबह शाम ज़हर

उन दरख़्तों में बैठे गवाह पंछी इक दिन
फिर वही ज़हर तुम्हे पिलाने लगते हैं

दुआ में उठते हाथों को इतना न करो मजबूर
कि वो हाथ पलट कर ताबूत बनाने लगें

ज़रा सोच लेना दीवारों में चुनवाने से पहले
गड़े मुर्दे कभी कभी अपनी दास्तान खुद सुनाने लगते हैं

पिंजरों में पालते हैं जो रंग बिरंगी चिड़ियाँ
होते ही क़ैद, दीवारों में बनाने लगते हैं नयी खिड़कियाँ

कहते रहे जो सबसे, मुझे किसी की ज़रूरत नहीं
फिर क्यों दो  चार दिन में मिजाज़ बदले से नज़र आने लगते हैं।©®

(Image Credit: Pixabay)

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